.... در شلوغی اتوبوس
زیبایی تو هدر می رود
.
.
.
عاشقان
سرشکسته گذشتند،
شرمسار ِ ترانههای بيهنگام ِ خويش.
| خسته |
|
| بر اسبان ِ تشريح، |
| نگونسار |
|
| بر نيزههایشان. |
| تو را چه سود |
||
| فخر به فلک بَر |
||
| فروختن |
||
| هنگامي که |
|
| هر غبار ِ راه ِ لعنتشده نفرينات ميکند؟ |
| که با ياسها |
|
| به داس سخن گفتهای. |
| گياه |
|
| از رُستن تن ميزند |
| تقوای خاک و آب را |
|
| هرگز |
| که از فتح ِ قلعهی روسبيان |
|
| بازميآمدند. |
|
سر برنگرفتهاند! ۲۶ دی ِ ۱۳۵۷ |